डूबते सूर्य को आज दिया जा रहा पहला अर्घ्य

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कोलकाता: छठ महापर्व का पहला अर्घ्य आज दिया जा रहा है। छठ पूजा में भगवान सूर्य की पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि भगवान सूर्य को प्रसन्न करने में जो जातक कामयाब होता है। उसकी हर मुराद पूरी होती है। मान्याता यह भी है कि जिन्हें संतान नहीं है, उन्हें संतान की प्राप्ति होती है।

इस साल छठ पूजा का पहला अर्घ्य 13 नवंबर को शाम को होगाऔर दूसरा अर्घ्य 14 नवंबर को दिया जाएगा। छठ का पहला अर्घ्य षष्ठी तिथि को दिया जाता है। अर्घ्य अस्ताचलगामी सूर्य को दिया जाता है। इस समय जल में दूध डालकर सूर्य की अंतिम किरण को अर्घ्य दिया जाता है। माना जाता है कि सूर्य की एक पत्नी का नाम प्रत्यूषा है और यह अर्घ्य उन्हीं को दिया जाता है।

छठ पर्व की विशेष बातें

छठ पूजा को लेकर हर घरों में चढ़ावे के लिए प्रसाद बनाए जाते रहे हैं। छठ पर्व की खास बात है कि इसमें व्रती खुद से ही सारी पूजा करते हैं। किसी पुरोहित या विशेष मंत्रों की जरूरत नहीं होती। पूजा का प्रसाद भी महिलाएं खुद ही तैयार करती हैं। कार्तिक मास में भगवान सूर्य की पूजा की परंपरा है। छठ पूजा के धार्मिक महत्व के साथ-साथ सभी इसके वैज्ञानिक पहलू भी हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक चलने वाले चार दिन के पर्व छठ को मन्नतों का पर्व भी कहा जाता है।

छठ पूजा की सामग्री

पहनने के लिए नए कपड़े, दो से तीन बड़ी बांस से टोकरी, सूप, पानी वाला नारियल, गन्ना, लोटा, लाल सिंदूर, धूप, बड़ा दीपक, चावल, थाली, दूध, गिलास, अदरक और कच्ची हल्दी, केला, सेब, सिंघाड़ा, नाशपाती, मूली, आम के पत्ते, शकरगंदी, सुथनी, मीठा नींबू (टाब), मिठाई, शहद, पान, सुपारी, कैराव, कपूर, कुमकुम और चंदन।

पूजा के समय व्रतियों के लिए नियम

1. व्रती छठ पर्व के चारों दिन नए कपड़े पहनें. महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनें।
2. छठ पूजा के चारों दिन व्रती जमीन पर चटाई पर सोएं।
3. व्रती और घर के सदस्य भी छठ पूजा के दौरान प्याज, लहसुन और मांस-मछली ना खाएं।
4. पूजा के लिए बांस से बने सूप और टोकरी का इस्तेमाल करें।
5. छठ पूजा में गुड़ और गेंहू के आटे के ठेकुआ, फलों में केला और गन्ना ध्यान से रखें।

कार्तिक शुक्ल षष्ठी को ही छठ मनाने का महत्व

छठ कार्तिक शुक्ल षष्ठी को ही मनाया जाता है। छठ-पूजा की कई कथाओं में से एक कथा का मूल प्रश्न यह है। इस कथा की मानें तो राजा प्रियंवद को कोई संतान न थी।महर्षि कश्यप की शरण में गए, पुत्रेष्टि यज्ञ हुआ और यज्ञाहुति की खीर राजा ने पत्नी मालिनी को खिलाई। यज्ञ के पुण्य-प्रभाव से मृत पुत्र हुआ।

अंत्येष्टि को श्मशान घाट पहुंचे राजा प्रियंवद पुत्र-वियोग में प्राण त्यागने को तत्पर हुए। दैव से यह दुख देखा नही गया। करुणा के वशीभूत एक देवी देवसेना प्रकट हुईं, कहा, ‘सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन! तुम मेरा पूजन करो, बाकी लोगों को भी प्रेरित करो।’ राजा ने इस देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें संतान की प्राप्ति हुई। कथा के अनुसार यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी और अब तक चलन चला आ रहा है।