जानिये लोहड़ी में क्यों जलाई जाती है आग

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कोलकाता डेस्कः आज देश भर में लोहड़ी का त्यौहार बड़े हर्षोउल्लास के साथ मनाया जा रहा है। हर साल ये त्यौहार 13 जनवरी को मनाया जाता है। खासकर हरियाणा औऱ पंजाब में इस त्यौहार की धूम देखने को मिलती है। लोहड़ी का त्योहार शरद ऋतु के अंत में मनाया जाता है। ऐसी मान्‍यता है कि लोहड़ी के दिन साल की सबसे लंबी अंतिम रात होती है और अगले दिन से धीरे-धीरे दिन बढ़ने लगता है।

इस दिन सभी अपने घरों और चौराहों के बाहर लोहड़ी जलाते हैं। आग का घेरा बनाकर दुल्ला भट्टी की कहानी सुनाते हुए रेवड़ी, मूंगफली और लावा खाते हैं। सभी लोग आग के गोल-गोल चक्कर लगाते हुए सुंदरिए-मुंदरिए हो, ओ आ गई लोहड़ी वे, जैसे पारंपरिक गीत गाते हुए ढोल-नगाड़ों के साथ नाचते-गाते इस त्यौहार को मनाते हैं।

पारंपरिक तौर पर लोहड़ी फसल की बुवाई और कटाई से जुड़ा एक विशेष किसानों का त्योहार है। इस अवसर पर पंजाब में नई फसल की पूजा करने की भी परंपरा है। लोहड़ी के दिन इसलिये आग जलाने की परंपरा है क्योंकि यह आग राजा दक्ष की बेटी सती की याद में जलाई जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार राजा दक्ष ने यज्ञ करवाया और इसमें अपने दामाद शिव और बेटी सती को आमंत्रित नहीं किया।

इस बात से निराश होकर सती अपने पिता के पास जवाब लेने गईं कि उन्होंने शिव जी को यज्ञ में निमंत्रित क्यों नहीं भेजा। इस बात पर राजा दक्ष ने सती और भगवान शिव की बहुत निंदा की। सती बहुत रोईं, उनसे अपने पति का अपमान नहीं देखा गया और उन्होंने उसी यज्ञ में खुद को भस्म कर दिया।

सती के मृत्यु का समाचार सुन खुद भगवान शिव ने वीरभद्र को उत्पन्न कर उसके द्वारा यज्ञ का विध्वंस करा दिया। वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि यह आग पूस की आखिरी रात और माघ की पहली सुबह की कड़क ठंड को कम करने के लिए जलाई जाती है।

इसके साथ ही इस दिन दुल्ला भट्टी की कहानी इसलिये सुनी जाती है क्योंकि कहते हैं कि मुगल काल में अकबर के दौरान दुल्ला भट्टी पंजाब में ही रहता है। कहते हैं कि दुल्ला भट्टी ने पंजाब की लड़कियों की उस वक्त रक्षा की थी जब संदल बार में लड़कियों को अमीर सौदागरों को बेचा जा रहा था। वहीं एक दिन दुल्ला भट्टी ने इन्हीं अमीर सौदागरों से लड़कियों को छुड़वा कर उनकी शादी हिन्दू लड़कों से करवाई थी।

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