क्या गांधी जी ने भगत सिंह को बचाने की कोशिश नहीं की थी?

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कोलकाता डेस्कः आज शहीदे ए आजम भगत सिंह की जयंती है। पूरा देश आजादी के मतवाले भगत सिंह की जंयती पर उन्हें याद कर रहा है। भगत सिंह की जयंती विशेष पर आज हम चर्चा कर रहे हैं, क्या गांधी ने भगत सिंह को बचाने की कोशिश की थी या फिर नहीं। अक्सर यह विषय चर्चा का रहा है।

महज 23 साल के नौजवान भगत सिंह की अद्भुत शहादत का गुमान और एक बूढ़े गांधी द्वारा उसे बचाए न जा सकने की शिकायत एक साथ मौजूद होती है। भगत सिंह पर बनाई गई बंबइया फिल्में हों या सोशल मीडिया पर युवाओं की जोशीली अभिव्यक्तियां, कई बार गांधी इनमें एक नकारात्मक भूमिका में दिखाये जाते हैं।

कहा जाता है कि दो स्वतंत्रता सेनानी इतिहास में ऐसे रहें जिनको जो उचित स्थान मिलना चाहिए था वह नहीं मिला। एक नाम भगत सिंह का होता है तो दूसरा सुभाष चंद्र बोस का। कहा यह भी जाता है कि सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह एक ही विचारधारा के थे। अगर नेहरू और गांधी चाहते तो भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव को फांसी से बचाया जा सकता था।

पूर्ण स्वराज को लेकर गांधी और भगत सिंह के रास्ते बिलकुल अलग थे। गांधी अहिंसा को सबसे बड़ा हथियार मानते थे और उनका कहना था कि आंख के बदले में आंख पूरे विश्व को अंधा बना देगी जबकि भगत सिंह का साफ मानना था कि बहरों को जगाने के लिए धमाके की जरूरत होती है। एक का रास्ता केवल राजनीतिक सत्ता के हस्तांतरण पर केंद्रित था जबकि दूसरे की दृष्टि स्वतंत्र भारत को एक समाजवादी और एक समतावादी समाज में बदलने की थी।

24 मार्च, 1931 के दिन भगत सिंह को फांसी दिए जाने की अगली सुबह गांधी जैसे ही कराची जो (वर्तमान समय में पाकिस्तान में स्थित है) के पास मालीर स्टेशन पर पहुंचे, तो लाल कुर्तीधारी नौजवान भारत सभा के युवकों ने काले कपड़े से बने फूलों की माला गांधीजी को भेंट की। स्वयं गांधीजी के शब्दों में, काले कपड़े के वे फूल तीनों देशभक्तों की चिता की राख के प्रतीक थे।

26 मार्च को कराची में प्रेस के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा मैं भगत सिंह और उनके साथियों की मौत की सजा में बदलाव नहीं करा सका और इसी कारण नौजवानों ने मेरे प्रति अपने क्रोध का प्रदर्शन किया है। ये युवक चाहते तो इन फूलों को मेरे ऊपर बरसा भी सकते थे या मुझ पर फेंक भी सकते थे, पर उन्होंने यह सब न करके मुझे अपने हाथों से फूल लेने की छूट दी और मैंने कृतज्ञतापूर्वक इन फूलों को लिया।

बेशक उन्होंने गांधीवाद का नाश हो और गांधी वापस जाओ के नारे लगाए और इसे मैं उनके क्रोध का सही प्रदर्शन मानता हूं। लेकिन इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने आगे कहा था- आत्म-दमन और कायरता से भरे दब्बूपने वाले इस देश में हमें इतना अधिक साहस और बलिदान नहीं मिल सकता। भगत सिंह के साहस और बलिदान के सामने मस्तक नत हो जाता है।

लेकिन यदि मैं अपने नौजवान भाइयों को नाराज किए बिना कह सकूं तो मुझे इससे भी बड़े साहस को देखने की इच्छा है। मैं एक ऐसा नम्र, सभ्य और अहिंसक साहस चाहता हूं जो किसी को चोट पहुंचाए बिना या मन में किसी को चोट पहुंचाने का तनिक भी विचार रखे बिना फांसी पर झूल जाये। अब सवाल कि क्या गांधी जी ने भगत सिंह को बचाने का प्रयास नहीं किया।

गांधी और भगत सिंह का आजादी पाने को लेकर रास्ता बेशक अलग रहा हो और इसको लेकर दोनों के बीच मतभेद भी थे, लेकिन अंतिम अवस्था तक आते-आते गांधी को भगत सिंह के प्रति बहुत अधिक सहानुभूति हो चली थी। महात्मा गांधी ने 23 मार्च 1928 को एक निजी पत्र लिखा था और भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी पर रोक लगाने की अपील की थी।

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