1 टन अतिरिक्त वजन के कारण असफल रही IRNSS-1H की लॉन्चिंग

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बेंगलुरु: क्या इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) द्वारा गुरुवार को छोड़ा गया भारत के आठवें नैविगेशन सैटलाइट IRNSS-1H की असफल लॉन्चिंग के पीछे एक टन का अतिरिक्त वजन रहा है? प्रॉजेक्ट से जुड़े वैज्ञानिकों ने इसे माना भी है। बता दें कि गुरुवार को लॉन्चिंग के कुछ देर बाद ही ISRO ने मिशन को असफल घोषित कर दिया था। इस वजन के कारण सैटलाइट की सफल लॉन्चिंग की ऊंचाई प्रभावित हुई और उसकी रफ्तार में प्रति सेकंड एक किलोमीटर की कमी आ गई।

ISRO सैटलाइट सेंटर के पूर्व डायरेक्टर एसके शिवकुमार ने कहा, ‘लॉन्च वीइकल अपने डिजाइन के अनुसार एक टन ज्यादा वजन लेकर जा रहा था और इसके कारण हीट शील्ड इससे अलग नहीं हो पाया। इस कारण रॉकेट की गति भी प्रभावित हुई। उदाहरण के तौर पर रॉकेट की गति प्रति सेकंड 9.5 किलोमीटर होनी चाहिए थी, लेकिन इसकी गति 8.5 किलोमीटर प्रति सेकंड ही रही।’ गौरतलब है कि 1,425 किलोग्राम वजन के सैटलाइट को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर के दूसरे लॉन्च पैड से PSLV-C39 के जरिए छोड़ा गया था। ISRO चेयरमैन एएस किरन कुमार ने मिशन के फेल होने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि सैटलाइट हीट शील्ड से अलग नहीं हो पाया।

एएस किरन कुमार ने कहा, ‘आंतरिक रूप से सैटलाइट अलग हो गया, लेकिन यह हीट शील्ड में बंद होता है। चौथे चरण में सैटलाइट को हीट शील्ड से अलग होना था। ऐसा होते ही यह ऑर्बिट में चला जाता। पहले तीन चरण में कोई समस्या नहीं आई।’

हीट शील्ड टेकऑफ के दौरान घर्षण से पैदा हुई गर्मी से सैटलाइट को बचाने के लिए लगाया जाता है। जब अंतरिक्ष की कक्षा में सैटलाइट को स्थापित कर दिया जाता है तब शील्ड उससे अलग हो जाती है। इस मामले में ऐसा नहीं हुआ और शील्ड सैटलाइट से अलग नहीं हुई।

शिवकुमार ने कहा, ‘मैं पूरे यकीन के साथ यह नहीं कह सकता कि सैटलाइट कितनी ऊंचाई तक गया। इसे पृथ्वी से 20,650 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित होना था, लेकिन यह 6,000 किलोमीटर तक ही जा सका।’

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